उपसहसंयोजक यौगिक क्या है इनका उपयोग व उपसहयोजकता –

उपसहसंयोजक यौगिक –

जिनमें कोई भी परमाणु या आयन इसको घेरे हुए अणुओं अथवा धनायनों के व्यूह से जुड़ा हो। लगभग से धातु-युक्त यौगिक उपसहसंयोजक यौगिक ही हैं।

उपसहसंयोजक यौगिको का परिचय –

धातुओं की सामान्य बंधुता को प्राथमिक बंधुता कहा जाता है। कुछेक धातुओं में प्राथमिक बंधुता के अलावा एक ओर भी बंधुता होती है, जिसे द्वितीयक बंधुता कहा जाता हैं। इस द्वितीयक बंधुता को ही उपसहसंयोजकता का व ऐसे बने यौगिकों की उपसहसंयोजक-यौगिक का नाम दिया जाता है। ऐसे यौगिकों को वेर्नर ने उच्च वर्ग यौगिक कहा है।

धनात्मक आयन

 विशेषत जब वे छोटे और उच्च आवेशित होते हैं, पार्श्ववर्ती घटते आयनों या  उदासीन अणुओं से  जिनमें असाझी इलेक्ट्रॉन रहते हैं  इलेक्ट्रॉन आकर्षित करते हैं। यदि आकर्षण ज्यादा  है तो धात्विक आयन व ओर समूहों के मध्य इलेक्ट्रॉन साझी हो जाता है। धात्विक आयन को यहाँ ग्राही व अन्य समूह को दाता कहते हैं। जब प्लैटिनिक क्लोराइड अमोनिया के साथ उपचारित होता  है तो ही ऐसा  यौगिक हेक्सामिनिक प्लैटिनिक हेक्साक्लोराइ  बनता है।

ये बने प्लैटिनम के यौगिक में न प्लैटिनम के व न क्लोरीन के ही परीक्षक लक्षण पाए जाते हैं। जिन समूहों में असाझी इलेक्ट्रॉन रहते हैं, वे हैं अमोनिया , जल (H2O), कार्बन मोनोऑक्साइड , नाइट्रिक ऑक्साइड , ऐल्किल ऐमिन , डाइऐल्किल ऐमिन , ट्राइऐल्किल ऐमिन , ऐल्किल सल्फाइड (RSR), साइआनाइड (CN), थायोसाइआनाइड (SCN) इत्यादि।

उपसहसंयोजक यौगिको का उपयोग

उपसहसंयोजक-यौगिक के कई प्रकार  होते हैं। इनमें से कुछ बहुत उपयोगी सिद्ध होते  हैं। इनका प्रयोग उत्तरोत्तर बढ़ा  है। भारी धातुओं के ऐसे ही संमिश्र साइआनाइड विद्युत लेपन में उपयोग में आते हैं। बहुत ऐसे यौगिक महत्व के वर्णक हैं। प्रशीयन ब्ल्यू, हीमोग्लोबिन, क्लोरोफिल इत्यादि  ऐसे ही वर्णक हैं। कुछ यौगिक, विशेषत: अंतराल लवण, धातुओं को पहचानने, पृथक्‌ करने व उनकी मात्रा निर्धारित करने में काम आते हैं।

उपसहसंयोजक यौगिक वियोजन

यह यौगिक प्राय कठिन आयन होते हैं। इनमें से ज्यादातर के जलीय विलयन आयनित नहीं होते व इस कारण विद्युत-अपघट्य नहीं होते है। परंतु इसके विपरीत, प्लेटिनम के निम्न उपसहसंयोजक यौगिक जल में वियोजित होकर कठिन आयन उत्पन्न करते हैं।

उपसहयोजकता –

यौगिकों में दो या दो से अधिक, किस्म के दाता आ पाते हैं। बीच में स्थित धात्विक आयनों में दाता समूहों की संख्या सभी धात्विक आयन के लिए निश्चित होती है। ऐसी संख्या को ही उपसहसंयोजकता-संख्या कहते हैं। Sidgwick के तहत यह संख्या तत्वों की परमाणु संख्या पर निर्भर करती है। यह लगभग दो से आठ तक हो सकती है। हाइड्रोजन की उपसहसंयोजकता संख्या दो है व भारी धातुओं की आठ। यदि दाता समूह अथवा परमाणु में एक जोड़े से ज्यादा असाझी इलेक्ट्रॉन हों, तो ऐसे समूह अथवा परमाणु दो धात्विक आयनों से संयुक्त हो सकते हैं। इस रीति से द्विनाभिक संमिश्र बनते हैं। ऐसा ही एक द्विनाभिक संमिश्र डाइओल ऑवटेमिन डाइकोबाल्टिक सल्फेट है

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